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भोर की पहली चुस्की (हिन्दी और मराठी कविताओं का संग्रह) जीवन प्रेम और कविता की आठ दशकों लंबी यात्रा है।
यह, एक लंबी पर सुंदर कविताओं की है यात्रा — होस्टल की उस लड़की की आवाज़, जो ऐसे मुख रित हुई जैसे सुबह का एहसास। घर को याद करती एक किशोरी से लेकर उस स्त्री तक की कहानी, जिसने भोर की शांत घड़ियों में अपनी आवाज़ फिर से पा ली।
दो भाषाओं में धरी पूरे जीवन की माला — तनहाई और खुशियों का समां, जश्न से निराला। यह संग्रह हिंदी और मराठी में सजे एक जीवन का विस्तार है: घर का वादा करती रेलगाड़ी की गूँज, भीड़ के बीच एक विधवा का अकेलापन, दो बेटियों का जन्म, चाँद पर मानव का कदम, और गेंदे के फूल की सरल पर गहरी सुंदरता।
हर कविता है एक संवाद — कभी खुशी, कभी ग़म का अनुवाद। प्रेम हो, पीड़ा हो, या हो कोई जश्न, इन कविताओं ने उठाए हैं ढेर सारे प्रश्न। कभी ये पंक्तियाँ चंचल हैं, कभी भीतर तक उतर जाने वाली, पर हमेशा सच्ची और मानवीय।
चाहे हिंदी में शोक की अभिव्यक्ति हो या मराठी में बुने गए रूपक, ये रचनाएँ प्रेम करना, खोना, देखना, समझना और मनाना — सब कुछ समेटे हुए हैं। गांधी जी के जन्म शताब्दी वर्ष पर गीत रचने से लेकर यह जानने तक कि व्हाट्सएप भी पीढ़ियों के बीच कविता पहुँचा सकता है, यह उस आवाज़ की कहानी है जिसने चुप रहना स्वीकार नहीं किया।
भोर की पहली चुस्की एक आमंत्रण है, “ठहरो, धीरे से एक घूँट लो, और कविता में जीए गए जीवन के सारे जायकों को महसूस करो।”
लेखिका के बारे में:
महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में एक रेल अधिकारी की पुत्री के रूप में पली-बढ़ीं उषा नंद पाटनकर ने बचपन से ही कविता लिखनी शुरू कर दी थी। उन्होंने मनोविज्ञान में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की, जिसने मानव भावनाओं और रिश्तों को समझने की उनकी दृष्टि को गहराई दी। परिवार की ज़िम्मेदारियों के चलते कुछ समय लेखन से दूर रहीं, पर बेंगलुरु में जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने फिर से कलम थामी। उनके सहयोगी पति अक्सर सुबह के लेखन समय चुपचाप उनके पास गरम फ़िल्टर कॉफी रख जाते थे।
उषा नंद पाटनकर का मानना है कि कविता ईश्वर का उपहार है। उनका विश्वास है कि हर कविता अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वयं अपनी भाषा — हिंदी या मराठी — चुन लेती है।